Wednesday, 7 May 2025

गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर- के.बी. के पुस्तकालय से (कवीन्द्र रबीन्द्रनाथ टैगोर की 166 वीं जयंती पर विशेष) (07/05/2025)

 




आज कवीन्द्र रबीन्द्रनाथ टैगोर की 166 वीं जयंती है।

आज अपनी निजी पुस्तकालय में पुरानी पुस्तकों को व्यवस्थित करने के क्रम में मुझे अपने पितामह कृष्ण बल्लभ सहाय की कुछ पुस्तकें मिली। ये पुस्तकें मुझे अपने मरहूम चाचा श्री राधेकान्त सहाय जी के सौजन्य से 2023 में प्राप्त हुई थी। 2024 में चाचाजी का निधन हो गया। अपने पिता कृष्ण बल्लभ बाबू के पुस्तकालय की पुस्तकें मुझे सौपते हुए उनके शब्द मुझे आज भी याद हैं- इस थाती को संभाल कर रखना।

आज रबीन्द्रनाथ टैगोर की जयंती पर जब में मैं अपनी निजी पुस्तकालय में किताबों को उलट-पलट रहा था तो मुझे टैगोर की लिखी और प्रकाशित कई किताबें मिली जो मेरे पितामह ने अपने पुस्तकालय में सहेज कर रखी थी। अँग्रेजी एवं बंगला में कवीन्द्र टैगोर की मूल रचनाएँ और उर्दू एवं हिन्दी में अनुवादित और साहित्य अकादमी द्वारा टैगोर की जन्म शताब्दी वर्ष (1961) में प्रकाशित ये किताबें अनमोल हैं। इन्हीं में से कुछ मैं साझा कर रहा हूँ।

गीत-पंचशती टैगोर की लिखी पाँच सौ चुने हुए गीतों का संग्रह है। इस पुस्तक में प्रख्यात चित्रकार श्री नंदलाल बोस के एक एचिंग की अनुकृति है। इस अनुकृति में रबीन्द्रनाथ टैगोर शांतिनिकेतन को अपनी कविता झूलन का पाठ करते हुए पेश किया गया है।





इसी प्रकार एकोत्तरशती रबीन्द्रनाथ टैगोर के एक सौ एक चुनी हुई कविताओं का संकलन है। इस पुस्तक में टैगोर द्वारा खुद की उकेरी एक पेंटिंग है जिस पर दिनांक 24/04/1896 अंकित है।



नाट्य-सप्तक टैगोर के साथ नाटकों का संग्रह है। इस पुस्तक में टैगोर की बाउल कलाकार के रूप में एक चित्र अंकित है जो अबनींद्रनाथ टैगोर द्वारा उकेरा गया है।





रबीन्द्रनाथ टैगोर से संबन्धित उर्दू में अनुवादित रचनाएँ है इक्कीस कहानियाँ, एवं दो उपन्यास तीन नाटक (जो तीन नाटकों डाक-घर’, राजा, और रक्तकरबी का संग्रह है) एवं चोखेर-बाली जिस पर फिल्म भी बन चुकी है।  






अँग्रेजी में स्वयं टैगोर द्वारा लिखित पुस्तक ग्लिम्पसेस ऑफ बंगाल (‘GLIMPSES OF BENGAL’) है। यह टैगोर द्वारा 1885-1895 के बीच लिखी चुने हुई खतों का संग्रह है जिसे 1930 में मैकमिलन की लंदन शाखा द्वारा प्रकाशित किया गया था। इस पुस्तक में टैगोर को सर की उपाधि से संबोधित किया गया है जबकि टैगोर ने सर की उपाधि जालियांवाला बाग कांड के बाद ही त्याज्य दिया था। इस पुस्तक की तमाम पृष्ठ कृष्ण बल्लभ बाबू की लाल-नीली पेंसिल से रंगे हुए हैं जिस में से एक मैं यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ-

India has two aspects- in one she is a householder, in the other a wandering ascetic. The former refuses to budge from the home corner; the latter has no home at all. I find both these within me. –Tagore, Balia, Tuesday, February, 1893.






मैं इन पुस्तकों को अभी तक आद्योपांत नहीं पढ़ पाया हूँ। किन्तु कृष्ण बल्लभ बाबू न केवल इन सभी पुस्तकों को पढ़ रखा था वरन जहां उन्हें कुछ पंक्तियाँ सटीक लगी उसे उन्होंने नीली-लाल पेंसिल से मार्क भी कर रखा है। कृष्ण बल्लभ बाबू की आदत में शुमार था कि किसी भी पुस्तक को पढ़ते हुए वे उन पंक्तियों को, जो उन्हें प्रभावित करते थे, लाल-नीली पेंसिल से चिन्हित करते जाते थे। प्रायः वे इन पंक्तियों का उद्धरण विधान सभा में बहस के दौरान करते थे। पुस्तक पढ़ने के बाद वे उस पर उनके पुस्तकालय में उस पुस्तक का परिग्रहन संख्या (ACCESSION NUMBER) लिखते और प्रथम पृष्ठ पर तारीख के साथ हस्ताक्षर कर पुस्तकालय में करीने से सभाल कर रख देते थे।  

     

Wednesday, 30 April 2025

K.B. Sahay- A Champion of the Oppressed & Suppressed - U.N. Sinha, I.A.S. (Retd) (30/04/2025)

 





Despite heavy strokes of the hammer, the real diamond remains imperishable. Such a one is valued at its real and intrinsic cost. The false one breaks to pieces. Through this allegorical verse, the saint poet Tukaram tries to impress upon our mind the matchless qualities of the brave, the industrious and the hectic souls. Sri K.B. Sahay, virtually the lion among various Chief Ministers of Bihar belonged to this category. He was, indeed, a most gallant horseman of Mahatma Gandhi’s Non-violent Army. Never did he waver or flinch from duty. To my mind, the two most outstanding achievements of K.B. Sahay will remain enshrined in the history of Bihar. These are- the abolition of the Zamindari system and his marvellous work and craving for the upliftment of the backward class, including the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes. It was K.B. Sahay who brought new life to the peasantry of Bihar. He was a magnetic touch. His part in the struggle for freedom is too well-known to be mentioned. Ever since he fell under the spell of Mahatma Gandhi’s influence, he devoted himself to the country’s service with a singleness of purpose and determination of spirit unequalled and unheard of in our history. His fiery zeal, intrepidity, his fervent patriotism and his capacity for sacrifice marked him out as a leader of outstanding ability. He soon won the confidence of the first Chief Minister of Bihar, Dr Sri Krishna Sinha and waged a relentless war against the atrocities committed by the dominant developed castes belonging to the Zamindar class against the have-nots of the society. Dr Sri Krishna Sinha’s idealism and impetuousness were moderated by K.B. Sahay’s practical sagacity and realism and since the one supplied what the other lacked, the work of the government went on smoothly and efficiently. K.B. Sahay had an unfailing sense of hard reality and his numerous speeches testify to the fact that he was highly concerned about the welfare of the Backward Class, Scheduled Castes and Scheduled Tribes. He did not utter eloquent words of oratory, nor did he pay mere lip homage to the ideals of liberty, equality and fraternity. Though his body has perished, his spirit will remain for ages to guide us and inspire us.

An intrepid fighter, a kind-hearted friend, an eminent patriot, a man of robust, pragmatic, inexhaustible capacity- a rare combination, indeed of the idealist and the practical, K.B. Sahay will be remembered long by the present and future generations of Bihar.

Verily in the poet’s words, he symbolized-

Statesman, yet friend to the truth! of soul sincere,

In action faithful, and in honour clear;
Who broke no promise, serv’d no private end,
Who gain’d no title, and who lost no friend
.  – Alexander Pope

A life so rich and fruitful as Sri Sahay’s fills us with hope and cheer. As we trudge our weary way through conflict and strife, it beckons us to approach our task with courage that never fails or falters but gathers fresh strength from each successive failure. He lived, he worked, and he suffered for the sake of our motherland. His name is inscribed in the hearts of millions of the have-nots of the society as one of the greatest benefactors of the Scheduled Castes, Scheduled Tribes, Minorities and Backward Classes.  

Sunday, 9 March 2025

‘कृष्ण बल्लभ बाबू- नमन उन्हें मेरा शतबार’ - योगेश्वर प्रसाद ‘योगेश’, भूतपूर्व, संसद सदस्य (लोक-सभा), भूतपूर्व मंत्री, बिहार सरकार ( 09/03/2025)

 

कृष्ण बल्लभ बाबू

कृष्ण बल्लभ बाबू के बारे में अंतरंगता के साथ लिखना मेरे लिए दुष्कर कार्य है। हमलोग दो अलग- अलग पीढ़ी के थे। उनके पुत्र गुतूल मेरे सहपाठी थे।

फिर भी उनके विषय में लिखकर मैं स्मृतिदर्पण करने का प्रयास कर रहा हूँ।

बिहार की विभूतियों में जब श्री बाबू एवं अनुग्रह बाबू का नाम लिया जाता है तो स्वतः कृष्ण बल्लभ बाबू का नाम भी मूंह से निकल जाता है। श्रीबाबू एवं अनुग्रह बाबू में मेधाशक्ति एवं माधुर्य का मणिकांचन संयोग था। परंतु कृष्ण बल्लभ बाबू में प्रखर मेधा तो थी पर माधुर्य का अभाव था। उनके मन जो बात स्फुरित होती थी उसे वे दो टूक कह दिया करते थे। अप्रिय सत्य बोलने में उन्हें कोई झिझक नहीं होती थी। पर ऊपर से शुष्क लगनेवाले कृष्ण बल्लभ बाबू भीतर से अत्यंत ही सहृदय थे।

उनकी दृष्टि में प्रतिष्ठित और तथाकथित शीर्षस्थ कार्यकर्ता एवं नए कार्यकर्ता में कोई अंतर नहीं होता था। दोनों के लिए उनके हृदय में समान स्थान रहता था। परंतु इसका भान मुझे बाद में हुआ। कॉलेज जीवन में मैं उनका आलोचक तो नहीं था पर उनका प्रशंसक भी नहीं था। दरअसल उनके पुत्र गुतूल जी (नर्बदेश्वर सहाय) सेंट कोलंबस कॉलेज में मेरे साथ पढ़ते थे। वे बड़े मंत्री के पुत्र थे और उनकी बातें ही कुछ और थी। और मेरे संवेदनशील मन में वे रास नहीं आते थे। यही कारण था कि अनजाने उनके पिता श्री कृष्ण बल्लभ सहाय के विरुद्ध अपने अवचेतन मन में बहुत सी गलत भ्रांतियाँ पाल रखी थी।

कॉलेज की पढ़ाई समाप्त करने के बाद जब मैंने राजनीतिक जीवन में प्रवेश किया तो उनके विरत व्यक्तित्व से निकट का संबंध हुआ। मुझे बड़ा ही दुख हुआ कि अनजाने मैंने कैसे भ्रामक विचार उनके संबंध में बना रखे थे। मैंने अपना राजनीतिक जीवन मजदूर आंदोलन के कार्यकर्ता के रूप में शुरू किया। मजदूर आंदोलन में हमारे नेता स्वर्गीय बी. पी. सिन्हा साहब थे। स्वर्गीय सिन्हा कृष्ण बल्लभ बाबू के निकटतम सहयोगी थे। दोनों का आपस में घनिष्ठ संबंध था। एक घटना स्मरण हो रही है। जब कृष्ण बल्लभ बाबू मुख्यमंत्री थे तो एक दिन उन्होंने हजारीबाग ज़िले के किसी ओद्योगिक अतिथिशाला में बी.पी. सिन्हा साहब और मुझे कुछ बातें करने के हेतु बुलाया। राजनीतिक बातें समाप्त होने के बाद हमलोग दिन के भोजन हेतु मेज पर बैठे। कृष्ण बल्लभ बाबू को नहीं मालूम था कि मैं निरामिष हूँ। निरामिष भोजन में मात्र भात और प्याज़ था। अतः मैंने भोजन नहीं करने का निश्चय किया। कृष्ण बल्लभ बाबू ने देखा कि यह युवक चुपचाप बैठा है और कुछ नहीं खा रहा है तो उन्होंने मुझसे नहीं खाने का कारण पूछा। फिर उन्होंने देखा कि मात्र भात और प्याज़ इसके गले के नीचे नहीं उतर सकता तो उन्होंने अतिथिशाला के प्रबन्धक से पूछा कि क्या दाल नहीं बनी है। प्रबन्धक ने संकोच से कहा “नहीं”। कृष्ण बल्लभ बाबू ने कहा इस मोहल्ले में किसी न किसी के यहाँ दाल तो पकी ही होगी तो जाओ कहीं से दाल ले आओ। और जब तक दाल नहीं आई तब तक कृष्ण बल्लभ बाबू ने भी कुछ नहीं खाया। इस बीच में हमसे कॉलेज जीवन के बारे में कुछ-कुछ पूछते रहे। उन्होंने यह भी पूछा कि गुतूल के साथ मेरा संबंध कैसा था। जब दाल आ गयी तो उन्होंने खाना शुरू किया। मज़ाक में बोले कि चलो तुम्हारे लिए दाल तो आ गयी किन्तु खाना ठंडा हो गया। मैंने भी दबे स्वर में उत्तर दिया कि मेरी दाल भी कुछ कम ठंडी नहीं है। इस पर वे खुल कर हँस पड़े। परंतु उनका आत्मीय व्यवहार से मेरे जैसा एक साधारण कार्यकर्ता उनसे अभिभूत हो गया।

कभी-कभी ऐसा संयोग होता है कि किसी महान व्यक्तित्व के सामने आने के बाद कुछ ऐसे भी लम्हे गुज़र जाते हैं जो मनुष्य के हृदय पटल पर स्थायी रूप से अचल बनकर स्मरण की कल्पना के सुखद प्रेरक परिच्छेद बनकर स्थायित्व ग्रहण कर लेते हैं।

हमारे मित्र श्री वीरेंद्र किशोर शरण, अधिवक्ता (डाल्टनगंज) ने, जो कृष्ण बल्लभ बाबू के संबंधी भी हैं, उनके रोचक प्रसंग का उल्लेख किया। कृष्ण बल्लभ बाबू कुर्ते के नीचे बनियान नहीं पहना करते थे। किसी ने पूछा- आप बनियान क्यों नहीं पहनते हैं’? उनका उत्तर मार्मिक था-कितनी साफ, कितना बेलाग कितना प्रेरक होने के साथ ही कितना निष्ठापूर्ण! कृष्ण बल्लभ बाबू ने कहा- मैं जीवन के प्रारम्भ में कुर्ता एवं बनियान दोनों ही पहनने की स्थिति में नहीं था। मेरी माली हालत उतनी अच्छी नहीं थी। इसलिए मैं कुर्ते के नीचे बनियान नहीं पहनता था। अब वो हमारी आदत बन गयी है। यही वजह थी कि कृष्ण बल्लभ बाबू कुर्ते के नीचे बनियान नहीं पहनते थे।

कैसी थी उनकी सादी ज़िंदगी, और कितने अनुकरणीय थे उनके आदर्श! साथ ही सच्चाई को स्वीकारने की शक्ति। जो भी उनके व्यक्तित्व के निकट पहुंचा उसे यह कभी एहसास नहीं हुआ कि वे अनजान हैं। लगता था कि ये उस व्यक्ति को जन्म-जन्मांतर से जानते हैं और वे उतनी ही निकट से उसे अपनाने की कोशिश भी करते थे। मुझे दुख होता है कि जिसने सारी ज़िंदगी ही समाज को बनाने में व्यतीत कर दी, जिन्होंने गरीबों एवं छुटभैयों को उनका हक़ दिलाने में हड्डी गला दी, जिन्होंने बिहार के सर्वांगीण प्रगति हेतु अथक परिश्रम किया, जिन्होंने जमींदारी उन्मूलन के द्वारा शोषण की प्रक्रिया को अवरुद्ध किया तथा  जिन्होंने देश को स्वतन्त्रता दिलाई, आज हम उन्हें भूलते जा रहे हैं। राजनीतिक शास्त्र के विद्वानों को उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व को चीर-स्थायी करने के हेतु उनकी प्रामाणिक जीवनी लिखनी चाहिए।   

(साभार- कृष्ण बल्लभ सहाय स्मृति पत्रिका, जन्म-जयंती समिति द्वारा प्रकाशित 31/12/1986)

      

      

Friday, 28 February 2025

भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की पुण्य-तिथि पर विशेष (28/02/2025)

 

डॉ राजेंद्र प्रसाद 


स्वतंत्र भारत का पहला मंत्रिमंडल 








डॉ राजेंद्र प्रसाद की लिखी दो पुस्तकें खंडित भारत (INDIA DIVIDED) एवं आत्मकथा (AUTOBIOGRAPHY) से आम पाठक भिज्ञ हैं किन्तु उनकी लिखी अन्य पुस्तकें भी उतने ही बहुमूल्य हैं। भारतीय संस्कृति एवं इतिहास का वर्णन करता पंडित जवाहर लाल नेहरू जी की लिखी पुस्तक भारत की खोज जितना महत्वपूर्ण है उसके समकक्ष ही है डॉ राजेंद्र प्रसाद की लिखी पुस्तक संस्कृत का अध्ययन- उसकी उपयोगिता और उचित दिशा। इस पुस्तक में संस्कृत भाषा की पूर्णता और उसके वागमय का विस्तार और महत्व का वर्णन है। यह पुस्तक स्थापित करती है कि हिन्दू धर्म एवं अध्यात्म और भाषाओं की जननी संस्कृत के प्रति यह प्रेम इन स्वतन्त्रता सेनानियों के दिल में गहरे बसते थे। यह कहना कि इन मुद्दों पर आज जितना बल दिया जा रहा है वो काँग्रेस के इन स्वतन्त्रता सेनानियों के समय नहीं हुआ सर्वथा गलत है। ये और बात है कि ये बहुमूल्य पुस्तकें राष्ट्रीय अभिलेखागार में धूल फांक रही है।

इसी प्रकार देश की शिक्षा पद्धति पर डॉ राजेंद्र प्रसाद की पुस्तक भारतीय शिक्षा एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है जिसमें उन्होंने शिक्षा एवं आत्मविद्या, नारी-शिक्षा का आदर्श, गुरुकुल एवं राष्ट्रीय शिक्षा का स्वरूप, विज्ञान की साधना और साध्य, व्यावहारिक कृषि शिक्षा, बुनियादी तालिम, विद्यार्थी एवं राजनीति आदि अनेक विषयों पर अपने विचार रखे और स्वतन्त्रता के बाद सरकार ने इस ओर पहल भी किए। डॉ राजेंद्र प्रसाद ने हिन्दी एवं अँग्रेजी में और भी पुस्तकें लिखी हैं। इनमें प्रमुख हैं –MAHATMA GANDHI IN BIHAR’, SATYAGRAHA IN CHAMPARAN आदि आदि।

डॉ राजेंद्र प्रसाद की लिखी ये सभी पुस्तकें स्वतन्त्रता संग्राम के साथ साथ काँग्रेस के संघर्षों का तथ्यात्मक इतिहास है। उस दौर के अन्य स्वतन्त्रता सेनानियों ने भी तात्कालिक इतिहास की तथ्यात्मक जानकारी देते हुए पुस्तकें लिखी हैं। कमी केवल पढ़ने वालों की है। उस दौर के बारे में जिस प्रकार के दुष्प्रचार आजकल हो रहे हैं और जिस प्रकार तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर सोश्ल मीडिया पर जानकारियाँ उपलब्ध कराई जाती हैं वो निश्चय ही भर्त्सना के योग्य है। आजकल यह भी शिकायत होती है कि पढ़ाई के दौरान इतिहास की सही जानकारी नहीं दी गयी। इतिहास की सही जानकारी के लिए राष्ट्रीय अभिलेखागार का खाक छानना पड़ता है और इतिहास की घटनाओं के प्रति मौलिक विचार बनाने की आवश्यकता है जिसके लिए स्वपाठन ही विकल्प है। किन्तु आज की पीढ़ी जो हर चीज़ चीज़ इंस्टेंट चाहती है के पास स्वपाठन के लिए पास समय नहीं है। वो सोश्ल मीडिया के इतिहास से ही अपना ज्ञान संवर्धन कर संतूष्ट है। इसका प्रभाव हर ओर दिखता है।

डॉ राजेंद्र प्रसाद द्वारा लिखी पुस्तकों के अलावे डॉ राजेंद्र प्रसाद की स्मृतियों को समर्पित पुस्तकों की भी कमी नहीं है। देशपूज्य राजेंद्र प्रसाद ऐसा ही संकलन है। किन्तु हिन्दी में लिखी इस पुस्तक को पढ़ने में आज किसे रुचि होगी। इस पुस्तक के रचयिता श्री गदाधर प्रसाद अंबष्ट हैं जिन्होंने पुस्तक की प्रस्तावना में उन्हें इस पुस्तक को लिखने में मिले बुद्धिजनों के सहयोग पर आभार व्यक्त किया है। इन महानुभावों में बाबू कृष्ण बल्लभ सहाय भी थे। इसी प्रकार लोकप्रिय कवि प्रोफेसर शिव पूजन सहाय द्वारा डॉ राजेंद्र प्रसाद पर संकलित लेखों की पुस्तक राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद तात्कालिक इतिहास का गुणात्मक अध्ययन है। आजकल युवाओं में किताबें पढ़ने की आदत नहीं रही है और हिन्दी में लिखी पुस्तकों के पाठक तो नगण्य हैं। किन्तु यदि देश का सही इतिहास पढ़ने का चाव है तो सत्य के दर्शन यहीं होंगें।             

Wednesday, 26 February 2025

कृष्ण बल्लभ सहाय का व्यक्तित्व - श्रीमती प्रमोदिनी सिन्हा (26/02/2025)

यह लेख उपरोक्त संग्रह से लिया गया है। 

 कृष्ण बल्लभ सहाय का व्यक्तित्व

श्रीमती प्रमोदिनी सिन्हा

सादा जीवन उच्च विचार में विश्वास करनेवाले बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय कृष्ण बल्लभ सहाय का जन्म 31 दिसंबर 1898 ईस्वी में पटना ज़िले के शेखपुरा गाँव में एक मध्यम वर्गीय कायस्थ परिवार में हुआ था। श्री सहायजी ने बड़ी ही ईमानदारी, लगन और मेहनत से, कठिनाइयों से संघर्ष करते हुए अपने आप को इस योग्य बनाया कि एक दिन वे बिहार के प्रथम व्यक्ति हो सके।


श्री सहायजी की प्रारम्भिक शिक्षा पी.एन. एंग्लो स्कूल में आरंभ हुई। कुछ कक्षाएँ राम मोहन रॉय सेमीनारी से भी पास की। फिर हजारीबाग ज़िला स्कूल में नाम लिखाया। वहीं पर स्कूल शिक्षा समाप्त कर हजारीबाग के सैंट कोलम्बस कॉलेज में शिक्षा ग्रहण की और 1919 में अँग्रेजी स्नातक की परीक्षा प्रतिष्ठा के साथ पास की। विश्वविद्यालय में वे अव्वल आए और उन्होंने स्वर्ण पदक प्राप्त किया। इनकी तीव्र इच्छा कानून पढ़ने की थी। अतः इन्होंने पटना कॉलेज में कानून और एम.ए. की पढ़ाई साथ-साथ शुरू की। ये अत्यंत ही मेधावी छात्र थे। इनकी स्मरण शक्ति अत्यंत तीव्र थी एवं प्रत्येक विषय को अपनी कुशाग्र बुद्धि द्वारा समझ कर फिर ग्रहण करने का प्रयास करते थे। जो पुस्तक एक बार पढ़ लेते थे, जल्दी नहीं भूलते थे।


तात्कालिन राजनीतिक परिस्थितियों के प्रभाव में श्री के.बी. सहाय अपने आप को पृथक नहीं रख सके। दिन-प्रतिदिन की घटनाएँ उनके मानस पर एक-एक कर अपना अमिट छाप छोड़ती जा रही थी। यही कारण है कि जब 1920 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन आरंभ किया, इन्होंने इस आंदोलन में भाग लेने के निमित्त अपनी पढ़ाई-लिखाई छोड़ दी। वर्ष 1912 में राष्ट्रीय महाविद्यालय की स्थापना हुई थी। स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद इसके प्राचार्य नियुक्त हुए और श्री कृष्ण बल्लभ सहाय ने इस महाविद्यालय में अँग्रेजी पढ़ाने का भार अपने कंधे पर लिया।


सन 1923 में देशबंधु चित्तरंजन दास ने स्वराज पार्टी की स्थापना की। श्री के.बी. सहाय को बिहार शाखा का सचिव बनाया गया। इसके साथ ही ये बिहार और उड़ीसा परिषद के लिए चुने गए जिसपर ये छ वर्षों तक रहे। उन दिनों विधान मण्डल में एक सदन हुआ करता था। ये अनेक क्रांतिकारी व्यक्तियों एवं संस्थाओं से सम्बद्ध थे। कहते हैं कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी जब जेल की दीवार फाँद कर भागे थे उस समय उनके लिए बिस्तर पर वे ही हाजरी बोलने के लिए लेटे। इस प्रकार निर्भीकता, अदम्य साहस एवं उत्साह का इन्होंने परिचय दिया।


सन1927 में स्थापित पटना युवक संघ के ये अध्यक्ष चुने गए। इसका मुख्य उद्देश्य था –सशस्त्र विद्रोह कर भारत माता की बेड़ियों को काटकर उसे स्वतंत्र कराना।  देवघर षड्यंत्र केस का जब ट्रायल चल रहा था तो उन्होंने असीम साहस का परिचय देते हुए दुमका जाकर अपनी आखों से ट्रायल देखा और निर्भीकतापूर्वक इन घटनाओं से संबन्धित एक लेख लिखा जो 8 जनवरी 1928 के सर्चलाइट प्रैस में छपा। सन 1930 से 1934 के बीच स्वतंत्र संग्राम में भाग लेने के कारण इन्हें चार बार जेल हुई। सन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान तो वे स्वतन्त्रता सेनानियों के मध्य अग्रणी रहे। सन 1942 में मौलाना मजरूल हक़ के जेल जाने के बाद अँग्रेजी साप्ताहिक द मदरलैंड का इन्होंने सम्पादन किया। इस पत्रिका से ये पहले से ही जुड़े हुए थे।  


सन 1937 से 1946 के मध्य जब बिहार में श्रीकृष्ण सिन्हा का मंत्रिमंडल बना तो इनको संसदीय सचिव चुना गया। 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतन्त्र हुआ। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद स्वतंत्र भारत के बिहार प्रांत में कृष्ण बल्लभ सहाय प्रथम राजस्व मंत्री बनाए गए। बिहार में लॉर्ड कार्नवालिस के समय से ही दमनकारी बंदोबस्ती चला आ रहा था। अतः यहाँ के जमींदारों को उनकी जमींदारी से च्युत करना कोई सरल बात नहीं थी। किन्तु वहाँ भी इन्होंने अपनी साहस और कर्मठता का परिचय देते हुए, सबकी आलोचना-प्रत्यालोचना की परवाह किए बगैर, जमींदारी उन्मूलन को कानूनी जामा पहना ही दिया।


सन 1963 में कृष्ण बल्लभ सहाय बिहार प्रांत के मुख्यमंत्री हुए। सन 1963 से 1967 तक इन्होंने इस पद की शोभा बढ़ाई। सन 1967 में आम चुनाव की घोषणा हुई और पटना निर्वाचन क्षेत्र से श्री महामाया प्रसाद सिन्हा ने इन्हें पराजित कर दिया, तथा बिहार में प्रथम सविंद सरकार की स्थापना हुई जिसमें श्री सिन्हा मुख्यमंत्री चुने गए। इसी सविंद सरकार ने इन पर अय्यर आयोग बैठाया था। पुनः 1974 में श्री कृष्ण बल्लभ सहाय ने स्वशासी निकाय निर्वाचन क्षेत्र से भारी मतों से विजय प्राप्त की।


परंतु नियति को यह मंजूर न था और शपथ ग्रहण करने के पूर्व ही हजारीबाग जाते समय कृष्ण बल्लभ सहाय की गाड़ी को किसी ट्रक ने पीछे से धक्का दे दिया। इस दुर्घटना में भारत माँ का एक सच्चा सिपाही सदा-सदा के लिए 3 जून 1974 को माँ की गोद में विलीन हो गया। यह भी एक विचित्र बात है कि जिस बिहार और उड़ीसा विधान परिषद की सदस्यता से कृष्ण बल्लभ सहाय ने अपना संसदीय जीवन प्रारम्भ किया था, पचास वर्षों के बाद पुनः उसी विधान परिषद से सदस्य निर्वाचित होकर इन्होंने अपने संसदीय जीवन का समापन किया।


राजनीतिक जीवन में अत्यंत व्यस्त रहते हुए भी श्री कृष्ण बल्लभ सहाय परिवार के प्रति कभी उदासीन नहीं रहे। जब भी जो भी समय मिलता ये उसी में सबकी पढ़ाई-लिखाई की ओर ध्यान देते। इनको कई सन्तानें थी। ये सभी की इच्छा पूरी करने के लिए सदैव प्रयास करते।


उच्च से उच्च पद पर पहुँचने पर भी इन्होंने कभी शान- शौकत नहीं की। सदैव खादी की मोटी धोती, कुर्ता और गांधी टोपी ही प्रयोग करते और उसे भी खुद अपनी हाथों से ढोते-फिचते। इस प्रकार दो-तीन सेट कपड़े में ही अपना काम चला लेते थे। वे खानपान में भी उदासीन थे। दाल-भात और आलू का भर्ता उनका प्रिय भोजन था। श्री कृष्ण बल्लभ सहाय का नियम था- नित्य प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में बिस्तर छोड़ देना, चाहे सर्दी हो अथवा गर्मी या बरसात। इसी समय ये ऑफिस की फाइलें देखते। फाइलों के मामले में ये कभी अपने सेक्रेटरी पर निर्भर नहीं रहते वरन पूरी की पूरी फाइल एक-एक शब्द ध्यान से पढ़ते और तब उस पर टिप्पणी लिखते। यही कारण है कि बिहारवासी आज भी उन्हें भूल नहीं पाये हैं। उनकी प्रशासनिक योग्यता की सदैव प्रशंसा की जाती है।              

Monday, 10 February 2025

अब ऐसे लोग कहाँ हैं - डॉक्टर शंकर दयाल सिंह भूतपूर्व सांसद (10/02/2025)




 अब ऐसे लोग कहाँ हैं

डॉक्टर शंकर दयाल सिंह

भूतपूर्व सांसद

शंकर दयाल सिंह (27 दिसंबर 1937- 27 नवंबर 1995) भारत के राजनेता तथा हिन्दी साहित्यकार थे। वे राजनीति और साहित्य दोनों क्षेत्रों में समान रूप से लोकप्रिय थे। 1971 में वे चतरा से लोक सभा के लिए चुने गए। 1990 में वे राज्य सभा के सदस्य बने। 1995 में उनकी असामयिक मृत्यु हो गई।

जहां तक मैं अपनी स्मरणशक्ति से उँगलियों पर बिहार के मुख्यमंत्री का नाम जोड़ता हूँ तो ऐसी गणना निकलती है कि मुख्यमंत्री श्री बिंदेश्वरी दूबे बिहार के चौदहवें मुख्यमंत्री हैं। नाम ही गिना दूँ- डॉ श्रीकृष्ण सिन्हा, पंडित बिनोदनंद झा, श्री कृष्ण बल्लभ सहाय, श्री महामाया प्रसाद सिन्हा, श्री सतीश प्रसाद सिंह (मात्र तीन दिनों के लिए), श्री बिंदेश्वरी प्रसाद मण्डल, श्री भोला पासवान शास्त्री, श्री सरदार हरिहर सिंह, श्री दारोगा प्रसाद राय, श्री केदार पांडे, श्री अब्दुल गफूर, श्री जगन्नाथ मिश्र, श्री कर्पूरी ठाकुर, श्री राम सुंदर दास, और उसके बाद पुनः डॉ जगन्नाथ मिश्र के बाद श्री चन्द्रशेखर सिंह।

लेकिन वास्तविकता ये है कि बिहार के तीसरे मुख्यमंत्री श्री कृष्ण बल्लभ सहाय ही प्रांत के आखिरी मुख्यमंत्री थे। उनके बाद जो मुख्यमंत्री हुए वे महज नाम के थे, काम के नहीं और उनका सिलसिला भी कुछ और ही रहा। दिल्ली ने उन्हें जब चाहा हटाया और जब चाहा बैठाया। इसके साथ ही जहां तक काम का प्रश्न है, अधिकांशतः मुख्यमंत्री क्लर्को से लेकर अफसरों की हाथ के कठपुतली रहे। कृष्ण बल्लभ बाबू इसके सर्वदा अपवाद थे।

क्या मजाल कि लिखने-पढ़ने और फाइल में कोई उन्हें चरा दे। बड़े-बड़े अधिकारी जिनमें आई.सी.एस. तक थे, उनकी स्पेलिंग को भी श्री कृष्ण बल्लभ बाबू अपनी लाल कलाम से सुधारकर फाइल वापस करते थे और कोई भी संचिका उनके पास अड़तालीस घंटे से अधिक नहीं रहती थी।

जैसे किसी परीक्षा की तैयारी कोई विद्यार्थी करता हो, उसी भांति वह सवेरे चार बजे अपने ऑफिस में बैठ जाते थे तथा फाइल देखना शुरू करते थे। छ्ह बजे तक दर्जनों फाइलें देखते, एक-एक पंक्ति पढ़ते और सही टिप्पणी देकर निबटाते। इसके बाद ही उनकी अन्य दिनचर्याएँ शुरू होती थी।

इसी भांति ट्रेन में, कार में, अथवा वायुयान में जब भी वे यात्रा कर रहे होते थे तो एक-एक संचिका करीने से देखते जाते थे और सहायक से लेकर सचिव तक के नोट को पढ़कर, देखकर, तजबीज करके ही कोई टिप्पणी देते थे या निर्णय लेते थे।

किसी ने उन दिनों ठीक ही कहा था कि श्रीबाबू का राज रोब से चलता था, बिनोदा बाबू का राजनीति से लेकिन कृष्ण बल्लभ बाबू का शुद्ध रूप से मुंशीगिरी से। कागज-पत्तर के मामले में क्या मजाल जो कृष्ण बल्लभ बाबू को कोई ठग दे। बड़े-बड़े दिग्गज अधिकारी उनके सामने जाने से घबड़ाते थे क्योंकि कृष्ण बल्लभ बाबू का काम सीधा लिखा-पढ़ी का होता था, चालाकी का नहीं।

आज के मंत्रियों का हाल जब देखता या सुनता हूँ तो हँसी आती है। बफशीट पर बफशीट जा रही है लेकिन अधिकारी फाइल भी नहीं भेजता है। किसी काम के लिए मंत्री महोदय ने बफशीट लिखकर भेजा और विभागीय क्लर्क उसे कहीं दबाकर रख देता है या फिर सीधे फाड़ कर फेंक देता है यह कहकर कि- ऐसा ऑर्डर तो रोज आता है

बात इतनी ही नहीं है। अनेक मंत्री को अपने अधीनस्थ अधिकारियों की खुशामद व चिरौरी करनी पड़ती है कि- फलां साहब यह काम हो जाता या एक सप्ताह पहले जो बफशीट भेजा था उसका क्या हुआ या यह कि जरा इस तरह का नोट बना कर भेज दीजिये बड़ी कृपा होगी। बात यहीं समाप्त हो जाती तो कोई बात नहीं थी किन्तु हद तो तब होती है जब इसके आगे यह कहते हैं कि क्या करें, हम तो चाहते थे, लेकिन कमिश्नर साहब या सेक्रेटरी साहब मान ही नहीं रहे हैं।

लेकिन कृष्ण बल्लभ बाबू के समय में बात ही कुछ दूसरी थी। फोन से उन्होंने किसी अधिकारी को कुछ कह दिया या कोई बफशीट भेज दी अथवा संचिका पर आदेश दे दिया तो फिर क्या मजाल कि चौबीस घंटे के अंदर उनकी तामिली न हो। सामान्य कर्मचारी उनसे घबड़ाते थे, उच्चाधिकारी तक उनके सामने काँपते थे तथा सियासत चलाने के उनके रोब से थरथरी पैदा हो जाती थी।

अपने सामने का एक उदाहरण दे दूँ। कृष्ण बल्लभ बाबू ने अपने समय के शिक्षा आयुक्त को बफशीट पर एक आदेश लिखकर भेजा, लेकिन तीसरे दिन तक सचिवालय से वो जारी नहीं हुआ। तीसरे दिन जब कृष्ण बल्लभ बाबू को इसकी जानकारी मिली तो उन्होंने शिक्षा आयुक्त को फोन किया और पूछा कि उस काम का क्या हुआ तो उधर से जवाब आया –सर, मैं इस पर अपनी टिप्पणी भेज रहा हूँ। दरअसल इसे ऐसे नहीं ऐसा होना चाहिए।

कृष्ण बल्लभ बाबू यह सुनते ही आग बबूला हो गए- मेरे आदेश देने के बाद आप कौन होते हैं उसे रोक कर रखने वाले? सरकार आप हैं या मैं हूँ? जनता ने आपको चुना है या मुझे? और इंक्वाइरी यदि होगी तो मेरे ऊपर होगा कि आपके ऊपर? आप सरकार के नौकर हैं और आपका काम है कि जो मिनिस्टर लिखकर आदेश दे या जो सरकार का आदेश हो उसकी तामिल करना। और आपसे यदि यह भी नहीं होता है तो आप आज ही इस्तीफा देकर चले जाइए नहीं तो मैं कल आपको सस्पेंड करके रहूँगा। कहते हुए कृष्ण बल्लभ बाबू ने फोन पटक दिया।

नतीजा यह हुआ कि उक्त अधिकारी ने पाँच बजे के बाद भी रुक कर उस काम का आदेश जारी किया तब सचिवालय से घर गया।

यह रोब था कृष्ण बल्लभ बाबू का!

काम-काज की नियमबद्धता भी उनकी विचित्र थी। ठीक समय पर कार्यालय आना, ठीक समय पर लोगों से मिलने बैठ जाना, एक-एक कर लोगों को बुलाना और मिलना और ठीक समय पर खाना, सोना और उठना।

काँग्रेस कार्यकर्ताओं की जितनी इज्जत उस समय मंत्रियों के बीच थी उसके बाद नहीं हो पायी। श्रीबाबू, अनुग्रह बाबू, बिनोदा बाबू, कृष्ण बल्लभ बाबू, महेश बाबू और वीरचंद पटेल आदि ऐसे नाम थे जो आज़ादी की लड़ाई में संघर्ष के साथ छन कर उभरे थे। अतः वे कार्यकर्ताओं का मूल्यांकन भी जानते थे। बाद के दिनों में मंत्रियों और कार्यकर्ताओं दोनों का स्तर ऐसा गिरा कि सेवा नाम की वस्तु से किसी का वास्ता ही नहीं रहा। बदले में दलाली का धंधा ही मुख्य हो गया।

एक जो सबसे बड़ी बात देखने में आती है वह यह है कि कृष्ण बल्लभ बाबू के समय तक बदली, प्रोन्नति, पोस्टिंग और बहाली आदि में अधिकारियों से पैसे लेने की दुर्व्यवस्था नहीं थी। मंत्री या नेतागण चुनाव आदि के समय अथवा संस्था को चलाने के लिए बड़े लोगों से या पूँजीपतियों, ठेकेदारों, उद्योगपतियों से ही पैसा लेते थे। उसके बाद ऐसा एक माहौल बन गया कि मंत्री खुले-आम अफसरों से घूस लेने लग गए। नतीजा यह हुआ कि अफसरों की नज़रों में मंत्रियों का कोई स्थान ही नहीं रहा और जो रिश्वत देकर बहाल हुआ था जिसकी प्रोन्नति हुई अथवा मनचाहे स्थान पर नियुक्ति हुई उसने अपना यह धर्म माना कि जितना खर्च किया है उसका पाँच-सात गुना वसूल कर लें।

हालांकि यह भी कहने में मुझे संकोच नहीं हो रहा है कि कृष्ण बल्लभ बाबू के मंत्रिमंडल में एक मंत्री ने अफसरों से पैसे लेने की शुरुआत कर दी थी, लेकिन चोरी-छिपे। उसके बाद तो यह खुले-आम पद्धति हो गयी। नतीजा यह हुआ कि कामचोर, बेईमान और रिश्वतखोर अधिकारियों का बोलबाला हो गया तथा ईमानदार अधिकारी पीसने लगा। इसकी प्रतिक्रिया सरकारी तंत्र पर सबसे अधिक है और भ्रष्टाचार जो प्रखण्ड स्तर से लेकर सचिवालय की बड़ी कुर्सी तक देखने में आ रहा है, उसका समाजीकरन कर दिया गया।

कृष्ण बल्लभ बाबू पर संयुक्त विधायक दल की सरकार ने अय्यर कमीशन बहाल किया था जिसमें उनके मंत्रिमंडल के सात और सदस्यों को शामिल किया गया था। उस समय कृष्ण बल्लभ बाबू के लॉकर और बैंक  से एक लाख रुपये मिले थे जिसके कारण उन्हें बेईमान करार दिया गया। उनकी सफाई कहीं नहीं सुनी गयी। अय्यर ने भी उनके वक्तव्य को अपनी रिपोर्ट में स्थान नहीं दिया। यह न्यायसंगत नहीं था।

कृष्ण बल्लभ बाबू एक सुयोग्य प्रशासक, ऊपर से कठोर लेकिन अंदर से कोमल, दोस्तों के लिए सदा तत्पर रहने वाले, अनुभवी और दिलेर व्यक्ति थे। मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने बिहार प्रांत में जो शासन किया वह किसी भी दूसरे मुख्यमंत्री ने नहीं किया। उनके समय तक मुख्यमंत्री की एक आब थी, इज्ज़त थी, रोब था, दबदबा था, और किसी प्रकार की ढील नहीं थी। बाद के दिनों में मुख्यमंत्री पद की गरिमा ऐसी समाप्त हुई कि उसे न तो जनता की श्रद्धा मिली, न दल का समर्थन मिला और सदा उनके ऊपर नंगी तलवार लटकती रही।

कृष्ण बल्लभ बाबू की साफ़गोई का भी कोई जवाब नहीं था। जिस काम को वे कर सकते थे उसमें हाँ कहने के बाद चाहे जैसे भी हो उसे पूरा करते थे और इसी प्रकार किसी भी काम को ना कहने में भी एक सेकंड के लिए भी देर नहीं करते थे। देखेंगें’, अच्छा हो जाएगा’, देखिये ज़ोर लगाता हूँ’, क्या कहें बहुत कोशिश की लेकिन नीचे वाले मानते ही नहीं हैं’, मैं तो भूल गया, अच्छा किया कि याद दिला दिया’, आदि वाक्य उनके शब्दकोश में नहीं थे। होना होगा तो वो काम तत्काल हो जाएगा अन्यथा न होना होगा तो उसी समय में भी हो जाएगा। लाग-लपेट और खुशामद-मलानत की ज़िंदगी उनकी थी ही नहीं।

और उसका बड़ा से बड़ा मूल्य चुकाने के लिए वे तैयार रहते थे और उन्होंने चुकाया भी। 1967 में वे पश्चिमी पटना से विधान सभा के उम्मीदवार हुए। उससे पहले भी वे इसी क्षेत्र से विधान सभा में चुनकर गए थे। उनके मुख्यमंत्रित्व काल में चुनाव के कुछ दिन पहले ही पटना में प्रदर्शनकारियों पर गोली चली, जिसमें आठ आदमी मारे गए।

लोगों ने बहुतेरा कहा कि अब आप पटना से न खड़े हों, लेकिन वे नहीं माने। इतना ही नहीं गोलीकांड के लिए कमीशन बिठाना भी उन्होंने स्वीकार नहीं किया। अपने चुनाव भाषण में हर जगह वे यही कहते रहे मेरे आदेश से गोली चली  क्योंकि मैं यहाँ का मुख्यमंत्री हूँ, अतः मेरी ज़िम्मेदारी है। मैं इसे किसी अधिकारी पर थोपना नहीं चाहता। गोली इसलिए चलायी गयी क्योंकि गुंडे खादी भवन में आग लगा रहे थे और पुलिस मुख्यालय को लूटना चाहते थे। ऐसे में गोली चली तो क्या बुरा हुआ? मैं यदि पुनः मुख्यमंत्री हुआ और ऐसी हरकत हुई तो गोली चलाने में मैं कभी पीछे नहीं हटूँगा।

अपनी साफ़गोई का उन्हें मूल्य चुकाना पड़ा। लेकिन उन्होंने गलत नीतियों से कभी संधि नहीं की। यही कारण है आज जब मैं उन्हें याद कर रहा हूँ तो निःसंकोच मेरे मूंह से यह वाक्य निकल रहा है कि बिहार प्रांत के वे आखिरी मुख्यमंत्री थे, जिन्होंने शान के साथ मुख्यमंत्रित्व किया।

टिप्पणी: ये विचार लेखक के हैं। “कृष्ण बल्लभ सहाय जयंती समारोह समिति” के नहीं- संपादक