Friday, 28 February 2025

भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की पुण्य-तिथि पर विशेष (28/02/2025)

 

डॉ राजेंद्र प्रसाद 


स्वतंत्र भारत का पहला मंत्रिमंडल 








डॉ राजेंद्र प्रसाद की लिखी दो पुस्तकें खंडित भारत (INDIA DIVIDED) एवं आत्मकथा (AUTOBIOGRAPHY) से आम पाठक भिज्ञ हैं किन्तु उनकी लिखी अन्य पुस्तकें भी उतने ही बहुमूल्य हैं। भारतीय संस्कृति एवं इतिहास का वर्णन करता पंडित जवाहर लाल नेहरू जी की लिखी पुस्तक भारत की खोज जितना महत्वपूर्ण है उसके समकक्ष ही है डॉ राजेंद्र प्रसाद की लिखी पुस्तक संस्कृत का अध्ययन- उसकी उपयोगिता और उचित दिशा। इस पुस्तक में संस्कृत भाषा की पूर्णता और उसके वागमय का विस्तार और महत्व का वर्णन है। यह पुस्तक स्थापित करती है कि हिन्दू धर्म एवं अध्यात्म और भाषाओं की जननी संस्कृत के प्रति यह प्रेम इन स्वतन्त्रता सेनानियों के दिल में गहरे बसते थे। यह कहना कि इन मुद्दों पर आज जितना बल दिया जा रहा है वो काँग्रेस के इन स्वतन्त्रता सेनानियों के समय नहीं हुआ सर्वथा गलत है। ये और बात है कि ये बहुमूल्य पुस्तकें राष्ट्रीय अभिलेखागार में धूल फांक रही है।

इसी प्रकार देश की शिक्षा पद्धति पर डॉ राजेंद्र प्रसाद की पुस्तक भारतीय शिक्षा एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है जिसमें उन्होंने शिक्षा एवं आत्मविद्या, नारी-शिक्षा का आदर्श, गुरुकुल एवं राष्ट्रीय शिक्षा का स्वरूप, विज्ञान की साधना और साध्य, व्यावहारिक कृषि शिक्षा, बुनियादी तालिम, विद्यार्थी एवं राजनीति आदि अनेक विषयों पर अपने विचार रखे और स्वतन्त्रता के बाद सरकार ने इस ओर पहल भी किए। डॉ राजेंद्र प्रसाद ने हिन्दी एवं अँग्रेजी में और भी पुस्तकें लिखी हैं। इनमें प्रमुख हैं –MAHATMA GANDHI IN BIHAR’, SATYAGRAHA IN CHAMPARAN आदि आदि।

डॉ राजेंद्र प्रसाद की लिखी ये सभी पुस्तकें स्वतन्त्रता संग्राम के साथ साथ काँग्रेस के संघर्षों का तथ्यात्मक इतिहास है। उस दौर के अन्य स्वतन्त्रता सेनानियों ने भी तात्कालिक इतिहास की तथ्यात्मक जानकारी देते हुए पुस्तकें लिखी हैं। कमी केवल पढ़ने वालों की है। उस दौर के बारे में जिस प्रकार के दुष्प्रचार आजकल हो रहे हैं और जिस प्रकार तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर सोश्ल मीडिया पर जानकारियाँ उपलब्ध कराई जाती हैं वो निश्चय ही भर्त्सना के योग्य है। आजकल यह भी शिकायत होती है कि पढ़ाई के दौरान इतिहास की सही जानकारी नहीं दी गयी। इतिहास की सही जानकारी के लिए राष्ट्रीय अभिलेखागार का खाक छानना पड़ता है और इतिहास की घटनाओं के प्रति मौलिक विचार बनाने की आवश्यकता है जिसके लिए स्वपाठन ही विकल्प है। किन्तु आज की पीढ़ी जो हर चीज़ चीज़ इंस्टेंट चाहती है के पास स्वपाठन के लिए पास समय नहीं है। वो सोश्ल मीडिया के इतिहास से ही अपना ज्ञान संवर्धन कर संतूष्ट है। इसका प्रभाव हर ओर दिखता है।

डॉ राजेंद्र प्रसाद द्वारा लिखी पुस्तकों के अलावे डॉ राजेंद्र प्रसाद की स्मृतियों को समर्पित पुस्तकों की भी कमी नहीं है। देशपूज्य राजेंद्र प्रसाद ऐसा ही संकलन है। किन्तु हिन्दी में लिखी इस पुस्तक को पढ़ने में आज किसे रुचि होगी। इस पुस्तक के रचयिता श्री गदाधर प्रसाद अंबष्ट हैं जिन्होंने पुस्तक की प्रस्तावना में उन्हें इस पुस्तक को लिखने में मिले बुद्धिजनों के सहयोग पर आभार व्यक्त किया है। इन महानुभावों में बाबू कृष्ण बल्लभ सहाय भी थे। इसी प्रकार लोकप्रिय कवि प्रोफेसर शिव पूजन सहाय द्वारा डॉ राजेंद्र प्रसाद पर संकलित लेखों की पुस्तक राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद तात्कालिक इतिहास का गुणात्मक अध्ययन है। आजकल युवाओं में किताबें पढ़ने की आदत नहीं रही है और हिन्दी में लिखी पुस्तकों के पाठक तो नगण्य हैं। किन्तु यदि देश का सही इतिहास पढ़ने का चाव है तो सत्य के दर्शन यहीं होंगें।             

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