K. B. SAHAY - MY GRANDFATHER, MY INSPIRATION.
Tuesday, 30 December 2025
K.B. Sahay - Birthday celebrations- 31.12.2025- Coverage in the media of Jharkhand and Bihar State (Courtesy: Manoj Sahay)
The 128th anniversary of the former Chief Minister of Bihar, 'The Iron Man of Bihar', Shri Krishna Ballabh Sahay, will be observed tomorrow (31.12.2025). Arrangements have been made by the Jharkhand Government to celebrate the occasion at his native place, Hazaribagh.
Newspaper coverage of the proposed event is being shared here.
(Courtesy Shri Manoj Sahay, General Secretary, JPCC.)
कृष्ण बल्लभ सहाय - गुमनाम सिपाही - शिवनाथ झा, 'द इंडियन नेशन' के वरिष्ठ पत्रकार
वैसे आप माने या नहीं। “चाय पर चर्चा” तो श्री कृष्ण बल्लभ सहाय प्रारम्भ किये थे अपने छोटे भाई श्री दामोदर प्रसाद सहाय के साथ बिहार में, शेष सभी “अनुयायी” हैं। बिहार में जब भी ‘यादव’ उपनाम पर चर्चा होगी, दो यादवों का नाम अवश्य आएगा और उनका भी नाम आएगा जो पिछड़ी जातियों के नाम पर ‘लच्छेदार राजनीतिक पराठे सकते’ आये हैं। अब इसे उनका ‘सौभाग्य’ कहिये या मतदाताओं का ‘दुर्भाग्य’ – बिहार के लोग प्रारम्भ से ‘लपेटे’ में आते रहे हैं। आज बिहार के चौथी पीढ़ी के मतदाता शायद ‘शेर-ए-बिहार’ और बिहार के ‘लौह पुरुष’ को जानता होगा ?
“सामाजिक न्याय के सूत्रधार थे कृष्ण बल्लभ सहाय । एक दौर था जब महज इन दो शब्दों से सवर्ण बहुल जमींदार वर्ग कभी इतना खौफजदा रहता था कि वे इन्हें जान से मारने की साजिश तक रच डाला था। बात 1947 की है। स्वतन्त्रता की दस्तक पड़ चुकी थी। बिहार में डॉ श्रीकृष्ण सिन्हा की सरकार बन चुकी थी। के. बी. इस सरकार में राजस्व मंत्री थे। बीते बीस वर्षों में उन्होंने गरीबों और पिछड़ों की व्यथा को बहुत करीब से देखा था।” “1923-1928 में स्वराज पार्टी के दिन रहे हों अथवा 1937-1939 का प्रथम काँग्रेस सरकार रहा हो या फिर काँग्रेस गठित किसान जांच कमिटी रहा हो- के.बी. गरीबों एवं पिछड़ों को न्याय दिलाने और समाज में उन्हें समान प्रतिष्ठा दिलाने को सदा कृत-संकल्प देखे जा सकते हैं। जमींदारी उन्मूलन का उनका ध्येय इसी उद्देश्य से प्रेरित था- उनका मानना था कि मनुष्य और मनुष्य के बीच समानता तभी स्थापित हो पाएगा जब सबों के साथ न्याय होगा और सबों के साथ न्याय तभी होगा जब समाज का पिछड़ा वर्ग अपना खोया सम्मान वापस पा पाएगा और जातिगत सामाजिक विषमताएँ दूर होंगी। जमींदारी उन्मूलन का उनका प्रयास पिछड़े वर्ग को यही खोया सम्मान वापस दिलाने की दिशा में एक कालजयी कदम था। उनका मानना था कि चारो वर्ण समाज रूपी गाड़ी के चार पहिये हैं। यदि चारो पहिये एक बराबर न हों तब समाज रूपी गाड़ी का चलना संभव नहीं है।” “उनकी दृढ़ता से भयभीत जमींदार जो सभी सवर्ण सम्पन्न वर्ण से आते थे ने उनपर सितंबर 1947 में कातिलाना हमले करवाए। किन्तु के. बी. का सौभाग्य था कि वे जीते रहे। सिर पर खून से सनी पट्टी बांधे जब उन्होंने बिहार विधान सभा में जमींदारी उन्मूलन कानून पारित करवाया तब वे सामाजिक न्याय के सबसे बड़े हिमायती के रूप में उभरे। के.बी. ने पिछड़ों के आर्थिक उत्थान के लिए जहां जमींदारी उन्मूलन किया वहीं उन्हें जागृत करने के लिए उनके बीच शिक्षा के प्रसार के लिए शिद्दत से प्रयासरत रहे। वे कहते थे कि ‘अमीरों के लड़के आगे बढ़ जाते हैं और आदिवासी एवं पिछड़े वर्ग के बच्चे पीछे पड़ जाते हैं। मैं पीछे पड़े समाज को आगे बढ़ाने की दिशा में कार्यरत हूँ’। के.बी. के इस सतत प्रयास का फल था कि पिछड़े वर्गों में अपने अधिकारों के प्रति एक नए जागरण का उदय हुआ और उन्होंने के.बी. की सरकार का खुल कर समर्थन किया- यह सर्वविदित है। किन्तु यह निकटता सवर्ण वर्गों को रास नहीं आई। 1967 में समस्त सवर्ण नव सम्पन्न जमींदार वर्ग उन्हें अभिमन्यु की तरह घेर कर हराया। जिसने ताजिंदगी पिछड़े वर्ग के हित की बात की और इस क्रम में अपने प्राण तक उत्सर्ग कर दिये उन्हें यह देश उनका अपना सूबा बहुत जल्दी ही बिसार दिया।” “यह इस देश के लिए बड़े शर्म की बात है कि सरकार उन्हें आज़ादी के गुमनाम सिपाही के तौर पर याद तो करती है पर महज इसलिए कि वे वोट की राजनीति से हाशिये पर ठेल दिये गए ‘कायस्थ’ वर्ण से आते हैं ‘भारत रत्न’ के रूप में स्वीकारने और इन्हें इस प्रतिष्ठता से नवजने से हिचकिचाती है। यह भी विडम्बना है कि के.बी. पर डाक टिकट जारी करने के दो प्रयासों को भी यह सरकार ठुकरा चुकी है। यह इस स्वतन्त्रता सेनानी, ‘सामाजिक न्याय के प्रथम सिपाही एवं सामाजिक न्याय की क्रांति के सूत्रधार के प्रति अक्षम्य अनदेखी है। आशा है इस सामाजिक न्याय के प्रणेता इस ध्वजा पुरुष को न्याय मिलेगा और सरकार उन्हें ‘भारत रत्न’ से अवश्य नवाजेगी।” बिहार में तीसरी विधान सभा काल में दो व्यक्ति मुख़्यमंत्री कार्यालय में बैठे। सन 1962 के चुनाव के बाद श्री बिनोदानंद झा के नेतृत्व में सरकार बनी। बिनोद बाबू ‘राजमहल’ विधान सभा क्षेत्र से चुनाव जीत कर आये थे। लेकिन पांच साल नहीं चले और उन्हें महात्मा गांधी के जन्मदिन के अवसर पर सं 1963 में मुख्यमंत्री की कुर्सी के बी सहाय के हाथ सौंपना पड़ा। सहाय बाबू 2 अक्टूबर, 1963 से 5 मार्च, 1967 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान रहे। तीसरी विधान सभा के बाद से लगातार बिहार में ‘आया राम – गया राम’ सिद्धांत पर सरकार बन रही थी, चल रही थी, जा रही थी। चौथे विधानसभा, जिसका चुनाव 1967 में हुआ था, चार मुख्यमंत्री महोदय, मसलन जनक्रांति दल के महामाया प्रसाद सिन्हा, शोषित दल के सतीश प्रसाद सिंह, बी पी मंडल और कांग्रेस के भोला पासवान शास्त्री का मुख्यमंत्री कार्यालय में ‘उदय’ और ‘अस्त’ हुआ। इसी तरह पांचवी विधान सभा (1969) में हरिहर प्रसाद, भोला पासवान शास्त्री, दारोगा प्रसाद राय, कर्पूरी ठाकुर का उदय-अस्त हुआ। लेकिन आज अगर पिछले 22 मुख्यमंत्रियों को एक नजर में देखें, तो बाबू श्रीकृष्ण सिन्हा को छोड़कर, कुछ ही मुख्यमंत्री हैं जिन्हें आज भी बिहार के लोग, बिहार के मतदाता, प्रदेश के विद्वान-विदुषी से लेकर अशिक्षित और अज्ञानी तक – नहीं भुला है और शायद भूल भी नहीं पायेगा। उन्हीं ‘ना भूलने वाले मुख्यमंत्रियों” की सूची में एक हैं बाबू कृष्ण बल्लभ सहाय। सन 1974 के 3 जून को बिहार के लौह पुरुष बाबू कृष्ण बल्लभ सहाय यानी के.बी. सहाय ‘आकस्मिक मृत्यु’ को प्राप्त किये। लगभग इन पांच दशकों में यह सार्वजानिक नहीं हो पाया की बाबू के बी सहाय को किसने मारा, क्यों मारा जब वे अपने हिंदुस्तान एम्बेसेडर (BRM 101) की अगली सीट पर बैठे थे और एक ट्रक उनके हँसते-मुस्कुराते शरीर को “पार्थिव” बना दिया। पटना-हज़ारीबाग की वह सड़क आज तक उस घटना को नहीं भूल पायी है।.....Wednesday, 29 October 2025
Chief Ministers of Bihar I K.B. Sahay: the CM under whom Congress lost its first majority Author: Shyamlal Yadav Indian Express, October 29, 2025
Chief Ministers of Bihar, I K.B. Sahay: the CM under whom Congress lost its first majority
Author:
Shyamlal Yadav
Indian
Express, October 29, 2025
(In
the lead up to the Assembly elections in Bihar, this is the fourth part of a
new series on the Chief Ministers of Bihar, from Shri Krishna Sinha to Nitish
Kumar.)
Bihar
boasts of one of the most fascinating political histories in India. As it heads
to Assembly polls next month, ‘The Indian Express’ brings a series of
articles that tell the history of Bihar politics through the tenure of its 23
Chief Ministers. This article tells the story of K.B., Bihar’s fourth CM.
After
Binodanand Jha was forced to step down due to the Kamaraj Plan, the Congress
Legislature Party (CLP) convened on September 24, 1963, to elect a new Chief Minister. Veteran Congressman S.K. Patil came from Bombay to oversee the polls.
Krishna
Ballabh Sahay emerged victorious over Birchandra Patel (The correct name is Beerchand Patel), the outgoing Finance Minister, backed by Jha. Sahay was sworn
in as CM on October 2.
Sahay’s
rise, however, was defined by the erosion of the autonomy of Congress state
units and the growing influence of the High Command sitting in New Delhi. Sahay,
for instance, travelled to New Delhi to consult with central leaders before
forming his ministries. It took several meetings, including one at Lal Bahadur
Shastri’s residence with Birchandra, to finalise the cabinet.
Sahay’s
ministry would be the last of an undivided Congress in Bihar: the party lost
its majority in the 1967 Assembly polls, and then suffered from a split in
1969.
Born
near Fatuah, in Patna, to a Kayastha family, Sahay was raised in Hazaribagh,
where his father served as a police inspector. Like his predecessors, he too
was a veteran of the freedom struggle and a member of the Constituent
Assembly.
Notably,
while serving as the Revenue Minister in Shri Krishna Sinha’s cabinet, Sahay
played a crucial role in drafting and implementing the Zamindari Abolition Act
in 1949. While initially closely allied to Shri Babu, Bihar’s first CM, by the
late 1950s, Sahay had grown closer to his rival Anugrah Narayan Sinha.
Sahay
had won the 1952 Assembly polls from the two-member-Giridih-cum-Dumri
constituency. However, his role in
abolishing Zamindari led to strong opposition from landlords, leading to his
defeat in 1957 at the hands of Raja Kamakhya Narain Singh.
But
Sahay remained politically active, and made a comeback in the 1962 polls before
becoming the CM in 1963.
Sahay’s
tenure came at a time when Congress, especially after Jawaharlal Nehru’s death,
faced unprecedented challenges.
The
1962 India-China War and the 1965 India-Pakistan War had left a major impact on
national politics. Meanwhile, the emergence of the Samyukta Socialist Party
(SSP), led by Dr Ram Manohar Lohia, led to a concerted anti-Congress wave in many
states. Lohia’s party appealed to farming communities and backward castes-
constituencies that would fundamentally alter Bihar politics in the years to
come.
Within
the Congress, internal conflicts strained Sahay’s leadership. The rejection of Birchandra
Patel, a Kurmi (OBC), for CM in 1963 fueled discontent among OBCs. Despite
appointing OBC leaders like Ram Lakhan Singh Yadav to his cabinet, Sahay could
not fully address these grievances.
Moreover,
when Yadav demanded 100 tickets for OBC candidates in the 1967 polls, there was
significant pushback from the state’s upper caste leaders, further complicating
matters for the Congress High Command. At the time, all prime positions in the
government and the party organisation remained with the upper castes.
In
the backdrop of these internal and external pressures, the 1967 elections
proved disastrous for the Congress.
On
January 5, 1967, police firing on protesting students in Patna resulted in numerous
deaths and sparked statewide unrest. The opposition capitalised on this,
forming a united front against the Congress.
The
polls, which took place in February, saw Congress winning only 128 out of 318
seats in the Assembly. Sahay himself suffered an embarrassing 20,000-vote
defeat to Mahamaya Prasad Sinha in Patna West while also losing from Hazaribagh,
his bastion. The SSP won 68 seats, the Bharatiya Jana Sangh 26, the Communist
Party of India 24, and the Praja Socialist Party (PSP) 18. This marked the end
of Congress's dominance in Bihar.
On
March 5, 1967, the Samyukta Vidhayak Dal (SVD) government replaced Sahay’s administration
as the first non-Congress government in the State.
In
October 1967, the new government under Mahamaya Prasad Sinha formed a
commission under retired Supreme Court Justice T.L. Venkatrama Aiyar to
investigate corruption allegations against Sahay and some of his ministers.
In
November 1969, when the Congress split, Sahay joined Congress (O) alongside
leaders like Morarji Desai. In 1974, at the age of 75, he was elected to the
Bihar Legislative Council before tragically dying in a road accident later that
year.
Monday, 27 October 2025
मुख्यमंत्री: एक मेडल, एक बगावत और एक नया नेता- कैसे जन्मे बिहार के चौथे सी.एम. के.बी. सहाय – जमींदारी की जड़ें हिला दी थीं - लेखक: संजय दुबे
मुख्यमंत्री: एक मेडल, एक बगावत और एक नया नेता- कैसे जन्मे बिहार के चौथे सी.एम. के.बी. सहाय – जमींदारी की जड़ें हिला दी थीं
(जनसत्ता
की मुख्यमंत्री शृंखला में आज पढ़ें बिहार के चौथे सी.एम. के.बी. सहाय की कहानी- एक
सख्त और ईमानदार नेता जिन्होनें कहा- “मेरे पास दिमाग और ताकत है, मगर जुबान नहीं” )
लेखक:
संजय दुबे
के.बी.
सहाय की कहानी अँग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत से शुरू हुई थी।
बिहार
की सियासत में कुछ नाम गुज़र जाने के बाद भी जेहन में ताजा रहते हैं। उनमें से एक
नाम हैं- कृष्ण बल्लभ सहाय- बिहार के चौथे मुख्यमंत्री। उनका नाम बिहार की राजनीति
में ऐसा रहा, जो अपने सख्त तेवर,
ईमानदार छवि और ज़मीन से जुड़े फैसलों के लिए जाना गया। एक ऐसा नेता, जिसने सत्ता को नहीं, सिस्टम को बदलने की ठानी। जिसने
जमींदारी प्रथा के खिलाफ कानून बना कर इतिहास लिख दिया, और
बेबाकी से कहा- ‘मेरे पास दिमाग है और है ताकत, मगर जुबान नहीं।’ यह कहानी है उस सख्त मगर ईमानदार
मुख्यमंत्री की, जिसने बिहार की राजनीति को नई दिशा दी।
31
दिसंबर 1898 को पटना ज़िले के शेखपुरा में एक मध्यमवर्गीय कायस्थ परिवार में जन्में
सहाय के पिता मुंशी गंगा प्रसाद अँग्रेजी हुकूमत में दारोगा थे, लेकिन बेटा बना अँग्रेजी हुकूमत का मुखर विरोधी। शिक्षा में इतना तेज की
सैंट कोलंबस कॉलेज, हजारीबाग से अँग्रेजी आनर्स में प्रथम
श्रेणी प्राप्त की, और अँग्रेजी भाषा में ऐसी पकड़ कि
बिहार-उड़ीसा के गवर्नर सर एडवर्ड गैट ने उन्हें स्वर्ण पदक से सम्मानित किया।
लेकिन यह स्वर्ण सम्मान भी उस युवक को ब्रिटिश साम्राज्य की चमक से नहीं बहका सका।
1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान उन्होनें हजारीबाग में नमक बनाकर बगावत की, जिसके लिए एक वर्ष की जेल काटनी पड़ी। जेल कोठरी में ही वे श्रीकृष्ण सिंह
जैसे कद्दावर नेता से जुड़े, और काँग्रेस राजनीति की राह पर
निकल पड़े।
आज़ादी
से पहले और बाद तक के.बी. सहाय वही रहे- बेबाक और निडर! असहयोग आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होनें सीना तानकर हिस्सा लिया। 1937 में जब
श्रीकृष्ण सिंह ने बिहार में पहली
काँग्रेस सरकार बनाई तो सहाय को संसदीय सचिव बनाया गया। 1946 में अन्तरिम सरकार
में वे राजस्व मंत्री बने और यहीं से
उन्होनें वो ऐतिहासिक कदम उठाया जिसने बिहार की ज़मीन की तस्वीर बदल दी- जमींदारी
उन्मूलन का कानून। सहाय के मसौदे पर श्री बाबू कैबिनेट ने मुहर लगाई और बिहार देश
का पहला राज्य बना जहां जमींदारी प्रथा को खत्म करने की घोषणा हुई। जमींदार वर्ग
उनसे खार खा गया। दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह और रामगढ़ के राजा कामाख्या नारायण
सिंह जैसे रसूखदार उनके विरोध में उतर आए। मगर सहाय नहीं डरे। वे मानते थे, “राजनीति सिर, हाथ और ज़ुबान- तीनों की मांग करती
है। मेरे पास सिर और हाथ है, मगर ज़ुबान की मिठास नहीं”। यही
सख्ती आगे चलकर उनके राजनीति सफर की पहचान बनी।
1952
में वे गिरिडीह से चुनाव जीते, लेकिन 1957 में उन्हीं
राजा रामगढ़ से हार गए। राजनीति के किनारे हुए तो फिर जन्मभूमि पटना लौटे, और 1962 में विधान सभा में फिर पहुंचे। तब तक श्री कृष्ण सिंह का निधन हो
चुका था और काँग्रेस में खेमेबाजी बढ़ चुकी थी। 1963 में जब मुख्यमंत्री बिनोदानंद
झा ने इस्तीफा दिया, तो सत्ता की दौड़ में कई नाम उछले-
वीरचंद पटेल, महेश प्रसाद सिन्हा,
सत्येंद्र नारायण सिन्हा- लेकिन अंततः जोड़तोड़ के इस खेल में बाज़ी मार ली के.बी.
सहाय ने। 2 अक्तूबर 1963 को वे बिहार के चौथे मुख्यमंत्री बने।
श्रीकृष्ण
सिंह की विरासत के बाद काँग्रेस में यह सत्ता में नया चेहरा था- जमीनी, निर्णायक और बिन लाग लपेट वाला। सहाय ने पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को
राजनीति की मुख्यधारा में जगह दी- राम लखन सिंह यादव,
सुमित्रा देवी, अब्दुल कय्युम अंसारी एवं जफर इमाम जैसे
नेताओं को कैबिनेट में शामिल कर उन्होनें सामाजिक संतूलन की नई परिभाषा दी। लेकिन इसी नीति से सवर्ण लॉबी नाराज़ हो गयी।
भीतरघात शुरू हुआ और आरोपों की झड़ी- भ्रष्टाचार, कमीशनखोरी, गुटबाजी। सहाय ने हर सवाल का जवाब ठंडे दिमाग से दिया, पर उनके खिलाफ दिल्ली तक शिकायतें पहुंची। बावजूद इसके वे नहीं झुके-
कहते थे- “कुर्सी टिके या ना टिके, फैसले जनता के हित में
होने चाहिए।”
5
जनवरी 1967 ने उनकी राजनीति की दिशा बदल दी। पटना विश्वविद्यालय में फीस की वृद्धि
को लेकर आंदोलन भड़का, पुलिस गोली चली और कई छात्र मारे
गए। विपक्ष ने इसे सरकार विरोधी आंदोलन बना दिया। सहाय ने जांच की अनुमति देने से
इनकार कर दिया- ‘ये विपक्ष की साजिश है, मैं प्रशासन को डरा नहीं सकता।” उन्होनें अपना इस्तीफा बढ़ा दिया।
काँग्रेस अध्यक्ष कामराज ने उनका इस्तीफा डस्टबिन में फेंक दिया। लेकिन जनता ने
1967 के चुनाव में जवाब दे दिया। सहाय दो-दो सीटों – पटना और हजारीबाग- से हार गए।
यही वो चुनाव था जिसमें मुख्यमंत्री को हराकर महामाया प्रसाद सिन्हा नए मुख्यमंत्री
बने और काँग्रेस सत्ता से बेदखल हुई। यही वो दौर था जब काँग्रेस की जड़ें उत्तर
प्रदेश-बिहार से उखड़नी शुरू हुई।
इसके
बाद सहाय की राजनीतिक यात्रा ढलान पर रही। 1969 में काँग्रेस टूटी तो वे “काँग्रेस
ओ” में रहे, पर अब न जोश था न जनसमर्थन। 1974 में
उन्होनें हजारीबाग से विधान परिषद की सीट जीती, लेकिन इसके
तुरंत बाद 3 जून 1974 को एक रहस्यमय सड़क दुर्घटना में उनका निधन हो गया। कहा जाता
है , सिंदूर गाँव के पास एक ट्रक ने अचानक रिवर्स किया और
उनकी एम्बेसडर कार (बीआरएम 201) से जोरदार टक्कर हुई। मौके पर ही सहाय की मौत हो
गयी।
उनके
विरोधी उन्हें सख्त कहते थे, पर अफसर और साथी मानते
थे कि उन्होनें निजी लाभ के लिए कभी भ्रष्टाचार नहीं किया। वे दूसरों के लिए काम
करते थे, खुद के लिए नहीं। राजनीति में सिर, हाथ और जुबान का उनका सिद्धान्त आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
कृष्ण
बल्लभ सहाय का जीवन बिहार की राजनीति का आईना है- संघर्ष, सुधार और सियासी साज़िशों से भरा हुआ। ये वो नेता थे जिन्होनें किसानों के
लिए जमींदारी तोड़ी, पिछड़ों को सत्ता में जगह दी और ईमानदारी
को राजनीति में टिकाने की कोशिश की। सत्ताएँ बदलीं,
पार्टियां टूटी, मगर कृष्ण बल्लभ सहाय का नाम बिहार की
मिट्टी में अब भी दर्ज़ है- एक ऐसे मुख्यमंत्री के रूप में ,
जो ना झुका, न बिका, बस अपनी राह
चला।























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